- “मीडिया माफिया” की बेल गेम रणनीति – क्या वापी में खंडनीखोर फिर होंगे आज़ाद?
- जमानत पर छूटे तो वापी के उद्योग जगत में लौटेगा ‘खंडनी आतंक’?


वापी | वापी GIDC में एक प्रतिष्ठित केमिकल कंपनी से ₹60,000 की खंडनी मांगने के मामले में दर्ज FIR (4 अगस्त 2025) के बाद भी आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है। सूत्रों के अनुसार, सभी आरोपी वापी और आसपास के क्षेत्रों में देखे जा रहे हैं, लेकिन पुलिस अब तक उन्हें पकड़ नहीं पाई है।

सबसे बड़ा सवाल यह है – क्या यह पुलिस की नाकामी है, या आरोपियों को किसी का संरक्षण मिल रहा है?
मुख्य आरोपी मेरु गढ़वी खुलेआम सोशल मीडिया पर सक्रिय है, अपने फेसबुक अकाउंट और Auranga Times अकाउंट से पोस्ट कर रहा है – मानो पुलिस को कह रहा हो, “मुझे पकड़ सकते हो तो पकड़ो”। यह खुलेआम चुनौती कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने जैसा है।
बेल गेम की साजिश?
आरोपी आलम ने अग्रिम जमानत की अर्जी डाल रखी है, जिसमें तारीख पर तारीख पड़ रही है। कानूनी जानकारों का कहना है कि यह एक सोची-समझी रणनीति है –
एक वरिष्ठ वकील के मुताबिक:
यदि किसी केस में आरोपी अधिक हों, तो अक्सर सबसे कम अपराधी भूमिका वाले की जमानत पहले ली जाती है।
अदालत में यह दलील दी जाती है कि चूंकि एक को जमानत मिल चुकी है, तो बाकी को भी समान आधार पर राहत मिलनी चाहिए।
यह तरीका एक “कानूनी रास्ता” होते हुए भी संगठित अपराध मामलों में केस को कमजोर कर सकता है।
- पहले कम भूमिका वाले आरोपी की जमानत करवा लो।
- फिर उसी आधार पर बाकी आरोपियों को भी राहत दिलवा दो।
- यह तरीका केस को कमजोर कर सकता है और संगठित अपराधियों के हौसले बुलंद कर सकता है।
वापी में खंडनी का धंधा
एक कहावत स्पष्ट बैठती है
बारिश के मौसम शुरू होते ही पत्रकार वापी के नदी नालों में मिलते है
उद्योग जगत में चिंता वापी में यह चर्चा आम है कि मानसून सीज़न में कई कथित पत्रकार कंपनियों को “केमिकल युक्त पानी” और “क्लोजर नोटिस” का डर दिखाकर वसूली करते हैं। सूत्रों के मुताबिक, क्षेत्र में लगभग 100 से अधिक पत्रकार सक्रिय हैं, जिनमें से कई का कोई अन्य व्यवसाय या स्थायी आय नहीं है। कहा जाता है कि छोटे व्यापारियों और कंपनियों से रोजाना ₹10000 से ₹15000 तक वसूली करना इनका “अनौपचारिक धंधा” बन चुका है। देखा जाए तो वापी वलसाड सिलवासा दमन का एक पत्रकार चाहे instagram ओर youtuber भी क्यू ना हो एक क्लेक्टर या पुलिश अधीक्षक से ज्यादा कमाई करता है लगभग 3 लाख रुपए महिना कमाता है दो दो iphone मोबाइक अर्थात गरबड़ तो स्पष्ट है
- व्यापारी जगत का कहना है कि मानसून में यह “मीडिया माफिया” का धंधा चरम पर होता है।
- बारिश के पानी के बहाने केमिकल युक्त प्रदूषण का आरोप लगाना।
- जीपीसीबी में शिकायत कर क्लोजर नोटिस का डर दिखाना।
- और फिर वसूली करना – यह इनका “सीजनल बिज़नेस मॉडल” बन चुका है।
जमानत मिलने पर खतरे (पुलिस और वकील का दृष्टिकोण)
- गवाहों और फरियादियों को डराना-धमकाना।
- सबूत नष्ट करना और पुलिस जांच में बाधा डालना।
- पुनः खंडनी वसूली शुरू करना।
- उद्योग जगत में डर और अविश्वास फैलाना।
- कानून का मजाक बनना और अपराधियों के हौसले बढ़ना।
- पुलिस सूत्रों का कहना है:
- FIR में स्पष्ट रूप से ₹15,000 की वसूली के ट्रांजेक्शन मेरु गढ़वी और जितेंद्र वाडवेकर के खातों में पाए गए हैं।
- शिकायतकर्ता के अनुसार, रकम 6 आरोपियों में बांटी गई थी, जिसमें से 4 के नाम FIR में दर्ज हैं और 2 के नाम जांच में हैं।
- यदि आरोपियों को अग्रिम जमानत मिलती है, तो वे गवाहों और फरियादियों को डराने-धमकाने का प्रयास कर सकते हैं।
- इससे न केवल वर्तमान केस कमजोर होगा, बल्कि उद्योग जगत में गलत संदेश जाएगा कि पत्रकारिता की आड़ में खंडनी मांगना “बिना डर” जारी रखा जा सकता है।
गंभीर धाराएं और सजा
- यह केस BNS 308(6), 308(7), 54 के तहत दर्ज है, जिसमें 10 साल तक की सजा का प्रावधान है। FIR में 4 आरोपियों के नाम साफ दर्ज हैं और 2 के नाम जांच में हैं। पुलिस को आशंका है कि यह एक बड़ा “मीडिया माफिया नेटवर्क” है जो संगठित तरीके से काम कर रहा है।
निष्कर्ष:
अगर ऐसे आरोपियों को अग्रिम जमानत या शुरुआती चरण में राहत मिल गई, तो यह वापी के उद्योग जगत के लिए एक खतरनाक संदेश होगा – कि पत्रकारिता की आड़ में खंडनी मांगना भी सुरक्षित धंधा बन सकता है।
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