पत्रकार बनाम उद्योग जगत : अब मीडिया को ही मीडिया की जरूरत

मनोज रावल | आर्टिकल :

वापी/वलसाड/सिलवासा | गुजरात में इन दिनों पत्रकारों और उद्योग जगत के बीच टकराव चरम पर है। जहां एक ओर पत्रकार आरोप लगा रहे हैं कि उद्योग जगत खंडणीखोर पत्रकारों की आड़ में ईमानदार पत्रकारों की आवाज दबा रहा है, वहीं समाज का एक बड़ा तबका मीडिया पर ही सवाल खड़े कर रहा है।

पत्रकारों का आरोप

  1. उद्योग जगत छोटे पत्रकारों को टारगेट बनाता है ताकि उनकी आवाज दबाई जा सके।
  2. फैक्ट्रियों से फैल रहे प्रदूषण और मजदूरों की मौत जैसे गंभीर मुद्दे उठाने पर पत्रकारों पर ही FIR कर दी जाती है।
  3. 90% पत्रकार आर्थिक रूप से कमजोर हैं, उन्हें विज्ञापन या झूठे केस में फंसाकर तोड़ा जाता है।
  4. अगर उद्योगपति निर्दोष हैं तो उन्होंने पत्रकारों को पहले पैसे क्यों दिए? रिश्वत देना और लेना दोनों अपराध हैं।

पत्रकारों का कहना है कि – अगर फैक्ट्री मालिक मजदूर सुरक्षा, प्रदूषण नियंत्रण और पारदर्शिता पर ध्यान दें तो किसी पत्रकार को खंडणी देने की नौबत ही नहीं आए।

समाज का कटाक्ष – “મીડિયાને હવે મીડિયાની જરૂર પડી છે”

समाज का एक वर्ग कह रहा है कि पत्रकार खुद ही अपनी साख खो चुके हैं।

पहले तो मीडिया ने दूसरों की कमज़ोरियों को बेचकर TRP और विज्ञापन कमाए, अब अपने ऊपर संकट आया तो गुटबाज़ी और गड़जोड़ में लगे हैं।

“સત્યના વેપારી હવે ખોટાના ભીખારી”सच बेचने वाले अब झूठ की भीख मांग रहे हैं।

जब आम जनता या उद्योग जगत पर मुसीबत आती थी, तब मीडिया ने सनसनी फैला कर मज़ा लिया। अब खुद पर आग लगी है तो सहारे खोज रहे हैं। ओर तरह तरह की बात कर के उद्योग जगत पर दोषारोपण कर रहे है।

मीडिया के विरुद्ध सवाल

  1. क्या मीडिया ने पत्रकारिता को समाज सेवा की जगह सिर्फ व्यवसाय और ब्लैकमेलिंग का धंधा नहीं बना दिया?
  2. छोटे पत्रकारों का सहारा लेकर बड़े मीडिया हाउस सिर्फ उद्योगपतियों से सेटिंग और मोटी कमाई कर रहे हैं – यह सच समाज देख रहा है।
  3. पत्रकारों की विश्वसनीयता गिराने का जिम्मेदार उद्योग जगत से ज्यादा खुद मीडिया है, क्योंकि उसने सत्य को बेचने और विज्ञापन की दलाली करने की आदत बना ली है।
  4. जब पत्रकार खुद ही किसी नेता, अफसर या उद्योगपति से सेटिंग कर ले, तो समाज उनसे सच्चाई की उम्मीद कैसे करे?

दोनों पर सवाल

  1. क्यों उद्योग जगत पहले दबंग पत्रकारों को पैसे देता है और बाद में उन्हीं पर केस करता है?
  2. क्यों पत्रकार आपसी लड़ाई और ब्लैकमेलिंग में अपनी साख खो रहे हैं?
  3. क्या पत्रकारिता अब समाज की आवाज है या महज़ एक रोज़गार और मुनाफाखोरी का माध्यम?
  4. क्या उद्योग जगत मजदूरों की मौत, प्रदूषण और भ्रष्टाचार से पल्ला झाड़ सकता है?

पत्रकार हों या उद्योगपति – दोनों ही कठघरे में हैं।

पत्रकार कहते हैं – “अगर हम सच्चाई न दिखाएं तो समाज को कौन दिखाएगा?”

लेकिन समाज पूछ रहा है – “अगर आप सचमुच सच्चे हैं तो फिर गड़जोड़ और खंडणी का खेल क्यों?”

👉 हकीकत यही है कि उद्योग जगत मजबूत और संगठित है। पत्रकार बिखरे हुए, गरीब और गुटों में बंटे हुए हैं। अगर पत्रकार एकजुट नहीं हुए तो उनका अस्तित्व उद्योग जगत की ताकत के सामने खो जाएगा।

🔥 “બીજાના ઘરમાં આગ લગાવનાર,
આજે પોતાના પર આવ્યું તો ગડજોડનો સહારો શોધનાર…
મીડિયા નહીં, ‘માઝાક’ બન્યા છો સાહેબ !”

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