डेयर टू शेयर | समाचार पत्र
दादरा और नगर हवेली में एक बड़ा बैंकिंग घोटाला सामने आया है, जिसने पूरे क्षेत्र को हिला दिया है। 77% दिव्यांगता वाले व्यक्ति के नाम पर फर्जी खाता खोलकर 89 लाख रुपये की धोखाधड़ी को अंजाम दिया गया। इस मामले में पुलिस ने मुख्य आरोपी शत्रुंजय और HDFC बैंक के पूर्व कर्मचारी राकेश को गिरफ्तार कर लिया है।



कैसे रची गई साजिश?
आरोपी शत्रुंजय ने अपने दिव्यांग भतीजे के नाम पर जुलाई 2022 में HDFC बैंक में खाता खोला। उसने खाते में अपना मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी जोड़ा और इस खाते के आधार पर क्रेडिट कार्ड प्राप्त किया। इसके बाद उसने QR कोड का इस्तेमाल कर क्रेडिट कार्ड से रकम ट्रांसफर की।
इस साजिश का भंडाफोड़ जनवरी 2025 में हुआ, जब बैंक कर्मचारी क्रेडिट कार्ड की बकाया रकम वसूलने पहुंचे। जांच के दौरान पता चला कि शत्रुंजय पहले भी कई लोगों के नाम पर फर्जी खाते खोल चुका है और बड़ी रकम का गबन कर चुका है।
FIR और कानूनी कार्रवाई
सिलवासा पुलिस ने इस मामले में IPC की धारा 419 (व्यक्तित्व की धोखाधड़ी), 420 (धोखाधड़ी), 465 (जालसाजी), 467 (महत्वपूर्ण दस्तावेजों की जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के लिए जालसाजी), और 471 (फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल) के तहत मामला दर्ज किया है।

पुलिस ने आरोपी के घर से कई संदिग्ध दस्तावेज और उपकरण बरामद किए हैं, जो अन्य मामलों में उसकी संलिप्तता की ओर इशारा करते हैं।
पूर्व बैंकर की भूमिका
HDFC बैंक के पूर्व कर्मचारी राकेश ने फर्जी खाता खोलने में शत्रुंजय की पूरी मदद की। राकेश ने बैंकिंग प्रक्रियाओं का गलत इस्तेमाल करते हुए इस घोटाले को अंजाम तक पहुंचाया।
क्या-क्या बरामद हुआ?
पुलिस ने आरोपियों के पास से बड़े पैमाने पर जालसाजी के उपकरण और दस्तावेज बरामद किए हैं:
- 124 QR कोड डिस्प्ले।
- 60 एटीएम और क्रेडिट कार्ड।
- 21 चेकबुक।
- 8 बैंक पासबुक।
- रबर स्टांप: सरकारी विभाग और निजी कंपनियों के नाम पर।
- 14 फर्जी वोटर ID
- 12 सिम कार्ड और 2 मोबाइल फोन।
- नकली प्रमाणपत्र और लेटरहेड।
बैंकिंग सिस्टम पर सवाल
यह घटना बैंकिंग सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती है। दिव्यांग व्यक्ति के नाम पर खाता खोलने और बैंकिंग नियमों की धज्जियां उड़ाने के लिए पूर्व बैंकर की मिलीभगत ने इस घोटाले को और खतरनाक बना दिया है।
क्या बदलनी होगी बैंकिंग सुरक्षा?
यह घोटाला दर्शाता है कि बैंकिंग संस्थानों को सुरक्षा उपायों को और सख्त बनाने की जरूरत है। कागजी दस्तावेजों की सत्यता और बैंक कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करना समय की मांग बन गई है।
इस घटना ने न केवल दिव्यांग व्यक्तियों को, बल्कि समाज के हर वर्ग को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या उनका बैंकिंग डेटा और पैसा सुरक्षित है?





