17 साल का रमज़ान गैरेज में करेंट लगने से मरा, लेकिन जिंदा है वो बेपरवाह व्यवस्था, जो बच्चों को मरने के लिए मज़बूर करती है।

सिलवासा | डेयर टू शेयर
सिलवासा में 8 अप्रैल की शाम को घटा एक हादसा समाज की खोखली संवेदनाओं को उजागर कर गया। रमज़ान शरीफ पठान, सिर्फ 17 साल का था — नाबालिग, लेकिन मजबूर। पेट की आग ने उसे स्कूल की बजाय गैरेज पहुँचा दिया, जहाँ करेंट ने उसकी जान ले ली।

गैरेज मालिक बेफिक्र, सिस्टम मूक, और समाज मौन है।
क्या यही है नए भारत का चेहरा, जहाँ बच्चों को काम पर भेजना विवशता नहीं, व्यवस्था की असफलता बन चुका है?
सवाल सिर्फ रमज़ान की मौत का नहीं है।
सवाल है उन अफसरों का, जो महीने में एक बार भी निरीक्षण नहीं करते।
सवाल है उन NGO का, जिनके बैनर बड़े और ज़मीर छोटे हैं।
और सवाल है उन समाजसेवियों का, जिनकी सेवाएं कैमरे के फ्लैश पर शुरू होती हैं और वहीं खत्म।
कहाँ हैं ये जिम्मेदार?
लेबर इंस्पेक्टर: कितने गैरेजों और होटलों का निरीक्षण हुआ पिछले 3 महीनों में?
NGO और बाल कल्याण समिति: क्या रमज़ान के लिए कोई योजना थी?
प्रशासन: क्या दोषी गैरेज मालिक पर कोई केस दर्ज हुआ?
“समाजसेवी या सिर्फ सेल्फीवी?”


हर महीने नई NGO, हर शहर में दर्जनों समाजसेवी…
पर जब एक गरीब बच्चा गैरेज में मर जाता है,
तो सबका सोशल मीडिया अकाउंट ‘डिस्कनेक्ट’ हो जाता है।
ना कोई ट्वीट, ना कोई स्टेटमेंट, ना कोई कैंडल मार्च।
शायद रमज़ान की मौत उनके ब्रांड प्रमोशन में फिट नहीं बैठती थी।
शायद इंसानियत अब सिर्फ इवेंट मैनेजमेंट बन गई है।
शायद… हम सब एक दिखावटी समाज के दर्शक हैं।
अब भी अगर हम नहीं जागे, तो अगला रमज़ान किसी और घर से उठेगा।
ये हादसे नहीं हैं — ये चेतावनियां हैं।
समय है – जागने का, सवाल करने का, और जवाब मांगने का।







