“जनता सवालों में उलझी, सांसद कार्यालय से जवाब नदारद!”


*सिलवासा, एक ओर सांसद कार्यालय की दीवार प्रशासन द्वारा ढहा दी गई, और दूसरी ओर जनता के मन में उठते सवालों को कोई जवाब नहीं मिला। हाल ही में “डेयर टू शेयर” समाचार संस्था द्वारा सांसद श्रीमती कलाबेन डेलकर को भेजे गए आवेदन में इस मामले पर प्रेस नोट की मांग की गई थी, ताकि फैक्ट्स पर आधारित जानकारी जनता तक पहुंच सके। लेकिन न तो कोई प्रेस नोट प्राप्त हुआ, और न ही आवेदन का कोई उत्तर ही सांसद कार्यालय से आया।



प्रश्न यह है कि क्या लोकतंत्र में सवाल पूछना गुनाह है? क्या जनता को यह जानने का हक नहीं कि उनका चुना हुआ प्रतिनिधि, एक संवेदनशील मुद्दे पर क्या रुख रखता है?
इस आवेदन में चार महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा गया था:
- क्या यह दीवार लीगल थी या अवैध?
- निर्माण कब हुआ था?
- क्या तोड़ने से पहले कोई नोटिस दिया गया था?
- अगर दीवार वैध थी, तो तोड़ने पर क्या कदम उठाए गए?
लेकिन सांसद कार्यालय की चुप्पी ने इन सवालों को एक दीवार से टकरा दिया है – और वो दीवार अब भी नहीं टूटी।

जनता में कार्यालय की दीवार का गिरना एक संवेदनशील मुद्दा बन गया है, लेकिन न सांसद महोदय का कोई बयान आया, न ही प्रेस के प्रश्नों का उत्तर। जवाब न देकर कहीं यह न मान लिया जाए कि “सवाल पूछना ही अपराध है।”
“डेयर टू शेयर” का उद्देश्य है कि जनता तक तथ्य पहुंचे, लेकिन जब सूचना के द्वार बंद हों, तब पत्रकारिता भी दीवारों से टकराने जैसा लगता है।
शायद सांसद कार्यालय की दीवार गिराना आसान था, पर जवाबदेही की दीवार अब भी बहुत मजबूत दिख रही है।







