राज्य का सपना या चुनावी स्टंट?आठवले को याद आया वलसाड – दमन-दीव को ‘राज्य’ बनाकर गुजरात का टुकड़ा जोड़ने की मांग!**

“राज्य का सपना या चुनावी छलावा? दमन-दीव को राज्य बनाने की मांग में वलसाड को भी घसीटा गया!”

“चुनाव आए, सपनों के सौदागर लौटे – आठवले को अब वलसाड याद आया!”

दमन/वलसाड, चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते हैं, नेताओं के वादों की झोली उतनी ही गहरी होती जाती है। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री रामदास आठवले ने सोमवार को दमन दौरे के दौरान एक नई राजनीतिक स्क्रिप्ट पेश की — दमन-दीव और दादरा नगर हवेली को नया राज्य बनाया जाए, और उसमें गुजरात का वलसाड जिला भी शामिल किया जाए।

आठवले ने यह भी कहा कि वे इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात करेंगे और जरूरत पड़ी तो आंदोलन भी करेंगे। साथ ही, आगामी पंचायत और नगरपालिका चुनावों को लेकर यह भी घोषणा कर डाली कि यदि भाजपा ने आरपीआई को पर्याप्त सीटें नहीं दीं तो उनकी पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी।

🎭 राजनीति या प्रहसन?
राजनीतिक गलियारों में आठवले के इस बयान को चुनावी शिगूफा बताया जा रहा है।
“वलसाड को एक राज्य में शामिल करने की बात तब क्यों नहीं की गई जब वहां विकास की जरूरत थी? अब चुनाव सामने हैं, तो नक्शा ही बदलने की बात हो रही है,” एक स्थानीय निवासी ने कटाक्ष किया।

सवाल उठता है कि क्या यह मांग जनहित में है या जनभावनाओं के साथ खिलवाड़? क्योंकि ना तो जनता की राय ली गई, और ना ही राज्य पुनर्गठन जैसे गंभीर मुद्दे पर कोई ठोस खाका पेश किया गया।

⚠️ सपनों के सौदागर फिर लौटे!
चुनाव आते ही नेताओं को विकास, अधिकार और नया राज्य याद आने लगता है।
ऐसे में आठवले की यह “राज्य मांग” को लेकर क्षेत्र की जनता का एक बड़ा तबका इसे सियासी नौटंकी बता रहा है। आरपीआई जैसी पार्टियां अक्सर बीजेपी की सहयोगी रही हैं, लेकिन चुनावों के समय खुद को अलग दिखाकर दबाव बनाना इनकी पुरानी राजनीति रही है।

🗳️ सीट नहीं मिली तो अकेले लड़ेंगे चुनाव!
आठवले ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि अगर भाजपा ने उनकी पार्टी को पर्याप्त चुनावी सीटें नहीं दीं, तो वे सभी सीटों पर खुद लड़ेंगे। अब यह बयान भाजपा के लिए सिरदर्द बन सकता है या महज एक और राजनीतिक सौदेबाजी, यह आने वाला वक्त बताएगा।

📌 “दमन-दीव को राज्य और वलसाड को जोड़ो” – मुद्दा या मखौल?
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस मांग में कानूनी, प्रशासनिक और राजनीतिक व्यावहारिकता का पूर्ण अभाव है।
“जब वोट चाहिए तो नेता बड़े-बड़े नक्शे खींचते हैं, लेकिन जनता अब समझदार है,” एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा।

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