जीवदया या ढोंग? वापी पांजरापोल में मृत गायों की दुर्दशा उजागर, वायरल वीडियो ने खोले पोल

आर्य पद्धति’ की आड़ में अमानवीयता! खुले मैदान में फेंकी गईं गायों की लाशें बन सकती है बीमारियों का अड्डा

“दान और धर्म के नाम पर पाप? पांजरापोल संचालकों की लापरवाही ने किया पर्यावरण और स्वास्थ्य को बीमार”

समाचार रिपोर्ट | वापी:
गुजरात के वापी के समीप स्थित राता पांजरापोल से वायरल हुआ एक वीडियो पशुप्रेमियों और आम जनता के बीच क्रोध और आक्रोश का कारण बन गया है। वीडियो में मृत गायों और अन्य पशुओं को खुले मैदान में फेंकते हुए देखा गया है। कुछ मृत देहों की खाल निकाली गई है और आसपास कुत्ते शवों को नोचते दिखाई देते हैं। यह दृश्य न केवल हृदय विदारक है, बल्कि यह जीवदया के नाम पर चल रहे कथित धर्मकार्यों की सच्चाई को उजागर करता है।

आर्य पद्धति या ढोंग?

इस घटना के बाद जब पांजरापोल संचालकों से जवाब मांगा गया, तो उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया को “आर्य पद्धति” करार देते हुए इसे धार्मिक और वैज्ञानिक आधार पर उचित बताया। उनका दावा है कि मृत पशुओं की खाल और हड्डियों का उपयोग औद्योगिक और चिकित्सकीय उद्देश्यों से किया जाता है, जिससे समाज को लाभ होता है और मृत पशु का अपव्यय नहीं होता।

लेकिन सवाल ? उठता है – क्या आर्य पद्धति का मतलब खुले मैदान में शव फेंककर दुर्गंध और बीमारी फैलाना है? यदि इस प्रक्रिया का पालन करना ही था, तो इसे वैज्ञानिक और स्वच्छ पद्धति से किया जाना चाहिए था, न कि लापरवाही और अनदेखी के साथ।

आर्य पद्धति क्या है?

आर्य पद्धति मूलतः एक पारंपरिक और पर्यावरणोन्मुख दृष्टिकोण है, जिसमें पशुओं की मृत्यु के पश्चात उनके शरीर का उपयोग विवेकपूर्वक किया जाता है – जैसे कि खाल, हड्डियां, सींग आदि को अलग करना। यह प्रक्रिया सम्मानजनक तरीके से, साफ-सुथरे और बंद परिसर में होती है, जिससे समाज को लाभ मिले, लेकिन प्रदूषण या बीमारी ना फैले।
लेकिन वापी पांजरापोल में यह प्रक्रिया खुले में, बिना सुरक्षा और बिना स्वच्छता के की गई, जिससे यह ‘आर्य पद्धति’ नहीं बल्कि ‘लापरवाही और कुकर्म’ प्रतीत होती है।

सरकारी नियम और सुझाव:

सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार, मृत पशुओं के निस्तारण के लिए:

नगर पालिका/ग्राम पंचायत के स्वीकृत डंपिंग ज़ोन या शव निस्तारण केंद्र का उपयोग किया जाना चाहिए।

शवों को खुले में फेंकना पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 और स्थानीय स्वच्छता कानूनों का उल्लंघन है।

यदि खाल निकाली जानी है, तो प्रक्रिया क्लीन्ड जोन में, जीवाणु रहित वातावरण में होनी चाहिए।

पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी खतरे:

वायु प्रदूषण: मृत देहों से उठने वाली दुर्गंध, हानिकारक गैसें वातावरण को प्रदूषित करती हैं।

जल प्रदूषण: वर्षा के पानी के साथ शवों से निकले तरल पदार्थ ज़मीन में रिसकर जल स्रोतों को दूषित करते हैं।

बीमारियाँ: खुले में फेंके शवों पर कुत्ते, गिद्ध और कीड़े पनपते हैं, जिससे रैबीज़, कॉलरा, डायरिया, स्किन इन्फेक्शन जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

आसपास के निवासियों की सेहत पर खतरा: बच्चे, बुजुर्ग और कमजोर इम्युनिटी वाले लोग इस वातावरण से जल्दी प्रभावित हो सकते हैं।

संचालकों की झूठी सफाई और असलियत:

पांजरापोल संचालक कह रहे हैं कि वीडियो से उन्हें बदनाम किया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि वीडियो में दिख रहे दृश्य क्या झूठे हैं?

यदि यह “दुष्प्रचार” है, तो शव खुले में क्यों पड़े हैं?

यदि यह “आर्य पद्धति” है, तो उसे वैज्ञानिक तरीके से क्यों नहीं अपनाया गया?

यदि “दान” के पैसे सही दिशा में खर्च हो रहे हैं, तो शवों की दुर्गति क्यों हो रही है?
साफ है कि या तो दान का पैसा गबन हो रहा है, या फिर संचालन में भारी लापरवाही है।

क्या हो समाधान? – एक व्यवहारिक पद्धति:

  1. नियमित शव निस्तारण सुविधा: हर पांजरापोल में शव जलाने/दफनाने या बायोगैस यूनिट की सुविधा होनी चाहिए।
  2. बंद परिसर में खाल निकालने की सुविधा: जिससे बीमारियाँ और बदबू न फैले।
  3. निगरानी तंत्र: प्रत्येक पांजरापोल की कार्यप्रणाली पर पशुपालन विभाग और पर्यावरण विभाग की निगरानी आवश्यक है।
  4. दान और आय का ऑडिट: पशुप्रेम के नाम पर लाखों-करोड़ों की आय होती है – उसका ट्रांसपेरेंट उपयोग सुनिश्चित किया जाए।
  5. जागरूकता और शिकायत तंत्र: जनता को जानकारी हो कि वो ऐसी लापरवाही की शिकायत किसे करें।

निष्कर्ष:

वापी पांजरापोल में जो हुआ वह एक isolated घटना नहीं है, बल्कि एक बड़े ढोंग और कुप्रबंधन का हिस्सा है। धर्म, जीवदया और सेवा के नाम पर चल रही संस्थाएं अगर ऐसे अमानवीय दृश्य पेश करें, तो यह हमारी संवेदनाओं और कानून दोनों का अपमान है। अब समय आ गया है कि शासन प्रशासन इस विषय में सख्त कदम उठाए, संपूर्ण जांच कराए, और दोषियों को सज़ा दे – ताकि न धर्म का अपमान हो, न जीवदया का मजाक बने।

इस मैटर पे विशेषज्ञ की क्या राय होती है विशेषज्ञ इस विषय पर क्या सोचते हैं:

1. कानून और नियम

  • सरकारी दिशानिर्देश: भारत सरकार और राज्य पशुपालन विभागों के नियम साफ कहते हैं कि मृत पशु के शव का निस्तारण वैज्ञानिक, स्वच्छ और नियत जगह (जैसे डम्पिंग ज़ोन या शव निस्तारण केंद्र) पर होना चाहिए, न कि खुले में फेंक कर
  • खतरे: खुले में शव फेंकना न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह वातावरण, जल स्रोतों और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करता है – जैसे कि जल और वायु प्रदूषण, संक्रमक बीमारियों के प्रसार की संभावना, और जानवरों द्वारा लाशों का नोचना

2. क्या है “आर्य पद्धति”?

  • सिद्धांततः “आर्य पद्धति” का अर्थ है पशु शव का सम्मानजनक, पर्यावरण-सम्मत और उपयोगी निस्तारण – जैसे कि खाल, हड्डियां आदि निकालना, और जीवाणु-रहित बंद परिसर में यह प्रक्रिया करना।
  • विशेषज्ञ मानते हैं कि जो दृश्य वायरल वीडियो में दिखा – खुले में शव, खाल निकालना, गंदगी और कोढ़ी प्रक्रिया – वह आर्य पद्धति नहीं कहलाती, बल्कि ‘लापरवाही’ और ‘कुप्रबंधन’ का द्योतक है

3. विशेषज्ञों के व्यावहारिक सुझाव क्या हैं?

  • गंभीर लापरवाही: विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि शव खुले में फेंके जा रहे हैं तो यह प्रबंधन की विफलता, दान का गलत इस्तेमाल, और पर्यावरणीय-अनुकूल न होने का प्रमाण है
  • स्वस्थ प्रबंधन:
  • शवों का या तो बंद परिसर में उचित खाल आदि निकालकर, फिर गहरे गड्ढे में दफन, या इन्सिनरेटर में जलाना जरूरी है
  • यदि बायोगैस या रेंडरिंग प्लांट है तो उसका रख-रखाव सुनिश्चित किया जाए
  • हर पांजरापोल में शव निस्तारण की स्थायी पुख्ता सुविधा, निगरानी तंत्र और ऑडिटिंग अनिवार्य मानी जाती है
  • अमानवीयता का विरोध: जानवरों की खुले में लाशें डालना, धार्मिक सेवा या दान की भावना के विपरीत है और इसका कोई धार्मिक या वैज्ञानिक औचित्य नहीं है

4. पशु कल्याण एवं जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

  • “गौशालाओं में लापरवाही पशु कल्याण के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन है। शव का अनुचित निस्तारण भीड़भाड़, बीमारी और सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरे की वजह बनता है। पांजरापोल प्रबंधन की जवाबदेही तय होनी चाहिए—सिर्फ धार्मिक भावना या दान से समस्या हल नहीं होती है…
  • कई जगहों पर स्थानीय प्रशासन की सुस्ती और ऑडिट की कमी से हालात बिगड़ते हैं। खोलापन, उपेक्षा और पारदर्शिता की कमी के चलते हालात खराब होते जा रहे हैं

निष्कर्ष

  • विशेषज्ञों की राय स्पष्ट है: ऐसे हादसों के लिए संस्थान, संचालन तंत्र और प्रशासन जिम्मेदार हैं। लापरवाही के लिए जवाबदेही, पारदर्शिता और नियमानुसार सख्ती आवश्यक है।
  • आर्य पद्धति, धर्म, दान या सांस्कृतिक परंपरा के नाम पर इस तरह की लापरवाही उचित नहीं है। समाज, प्रशासन और पशुप्रेमियों को मिलकर ऐसे मामलों में तुरंत कार्रवाई और सुधार लाना जरूरी है

Citations:
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[10] Popular Cow Care Centres in Vapi – Justdial https://www.justdial.com/Vapi/Cow-Care-Centres/nct-11042119
[11] Section Details – India Code https://www.indiacode.nic.in/show-data?actid=AC_JK_69_637_00005_00005_1613632495112&orderno=191
[12] Disposal of Carcasses and Disinfection of Premises https://www.msdvetmanual.com/management-and-nutrition/disposal-of-carcasses-and-disinfection-of-premises/disposal-of-carcasses-and-disinfection-of-premises
[13] [PDF] SLAUGHTER HOUSE WASTE AND DEAD ANIMALS https://mohua.gov.in/upload/uploadfiles/files/chap5.pdf
[14] Guidelines for Carcass Disposal https://cpcb.nic.in/openpdffile.php?id=TGF0ZXN0RmlsZS8zMTNfMTYxMDM1OTE0M19tZWRpYXBob3RvMjM3MC5wZGY%3D
[15] Procedures for disposing of dead animals https://www.malsparo.com/dead.htm
[16] Disposal of carcasses https://basu.org.in/wp-content/uploads/2020/06/Disposal-of-carcasses-1.pptx

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