“POCSO एक्ट की ‘सुपर स्पीड’ जस्टिस: डुंगरा पुलिस का ‘चुनिंदा संवेदनशीलता’… जहाँ सेमिनार तो होते हैं, पर शिकायतें सुनने वाला कोई नहीं!”
7 महीने के बाद FIR की रस्म ए अदाई
वापी का डुंगरा क्षेत्र एक बार फिर “न्याय की गति” के लिए चर्चा में है। यहाँ एक 13 वर्षीय बच्ची के साथ छेड़छाड़ का मामला सामने आया है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि पुलिस को इसकी FIR दर्ज करने में नवरात्रि से लेकर गर्मी तक का पूरा मौसम बीत गया!


क्या है मामला?
- नवरात्रि के दौरान आरोपी अशोक बिश्नोई ने नाबालिग लड़की को एकांत में बुलाकर उसके साथ छेड़छाड़ की और जान से मारने की धमकी दी।
- पीड़िता ने घटना अपनी माँ को बताई, लेकिन *पुलिस ने शिकायत लेने में ऐसी टालमटोल की कि माँ को पुलिस स्टेशन में ही *”सुसाइड की धमकी”* देनी पड़ी!*
- 7 महीने की जद्दोजहद के बाद, आखिरकार POCSO एक्ट के तहत FIR दर्ज हुई और आरोपी गिरफ्तार हुआ।
पुलिस की ‘लाइटनिंग’ एक्शन:
- 210 दिन की ‘गहन जाँच’ के बाद FIR दर्ज हुई।
- कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, कोई इंटरव्यू नहीं—जैसे मामला ही नहीं हुआ!
- स्कूलों में POCSO सेमिनार चल रहे थे, लेकिन एक माँ की गुहार सुनने वाला कोई नहीं!
- “FIR दर्ज करने में 7 महीने क्यों लगे? क्या पुलिस को ‘न्याय का कैलेंडर’ ही अलग मिला है?”
- “क्या आरोपी के पास इतना ‘पावरफुल कनेक्शन’ था कि शिकायत दबा दी गई?”
- “जब एक माँ सुसाइड की धमकी देती है, तब भी पुलिस क्यों सोती है?”
- “क्या POCSO एक्ट सिर्फ सेमिनारों तक ही सीमित है?”
- “अगर पीड़िता का परिवार मीडिया या सोशल मीडिया पर वायरल नहीं होता, तो क्या FIR कभी दर्ज होती?”
- “क्या यह केस सिर्फ इसलिए दब जाता अगर माँ ने वीडियो बनाकर धमकी नहीं दी होती?”
डुंगरा पुलिस ने एक बार फिर साबित किया है कि “न्याय मिलने की गति” उनके लिए ऑक्सीजन से भी धीमी है। जहाँ एक तरफ स्कूलों में “गुड टच-बैड टच” पर सेमिनार होते हैं, वहीं एक मासूम बच्ची की आवाज़ सुनने के लिए 7 महीने का ‘स्पेशल टाइम’ चाहिए!

7 महीने बाद हुई FIR, तब जागी डूंगरा पुलिस; बच्ची की मां की आत्महत्या की धमकी भी न हिला सकी सिस्टम को!”
डूंगरा, सिलवासा | जहां एक ओर डूंगरा क्षेत्र के स्कूलों में पोक्सो एक्ट और गुड-बैड टच पर जागरूकता सेमिनारों का आयोजन धूमधाम से किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर एक मां अपनी मासूम बच्ची के साथ हुई छेड़खानी की शिकायत के लिए 7 महीने तक दर-दर भटकती रही। सवाल यह है कि क्या जागरूकता सिर्फ बैनरों और कैमरों तक सीमित है?


FIR सिर्फ रस्म अदायगी बन गई है।
डूंगरा पुलिस स्टेशन को पूरे सात महीने लगे इस मामले में FIR दर्ज करने में। इस दौरान पीड़िता की मां ने थाने के अंदर ही वीडियो बनाकर आत्महत्या की धमकी तक दे डाली थी, फिर भी कार्रवाई के नाम पर “ठेंगा” मिला।
इंस्टा, यूट्यूब… पर SP साहेब श्री’ की चुप्पी!
हर छोटी-बड़ी घटना पर प्रेस नोट, बाइट और कैमरे के सामने सक्रिय रहने वाले SP साहेब इस मामले में रहस्यमयी रूप से गायब रहे। न कोई इंटरव्यू आया, न ही कोई आरोपी पत्रकारों के सामने लाया गया। सिर्फ एक अखबार ने इसे उठाया—बाकी सब खामोश क्यों?
परिवार की चप्पलें घिस गईं, अफसरों के दरवाजे थक गए।
बच्ची के माता-पिता ने कई अधिकारियों से गुहार लगाई, पर कोई सुनवाई नहीं हुई। मां का कहना है कि बच्ची का निवेदन कोर्ट में भी दर्ज हो चुका है और उन्होंने उच्च अधिकारियों तक अपनी फरियाद पहुंचाने की कोशिश की, पर हर जगह निराशा ही मिली।
अब सवाल ये हैं:
- आखिर सात महीने तक FIR क्यों लटकी रही?
- क्या आरोपियों को बचाया जा रहा था?
- क्या कोई दबाव था? या कोई सौदा?
प्रशासन जवाब दे— पत्रकार सवाल पूछना नहीं छोड़ेंगे!
हमारा काम है सवाल पूछना, भले ही उस पर आप हमें झूठी FIR से डराने की कोशिश करें। लेकिन इस मामले में हम फिर पूछेंगे—“क्या वजह थी साहेब, जो FIR में 7 महीने लग गए? क्या कुछ मिला था?”







